• कि एस.वी रचित प्रभातनां पुष्पो पहला ज्ञात गुजराती चिट्ठा है।
  • कि चिट्ठाकारी के लिये चीनी शब्द बो के है जिसका पहली बार प्रयोग फैंग जिंगडाँग ने किया।
  • क्या आप जानते हैं कि ब्लॉग शब्द आक्सफॉर्ड शब्दकोश में सम्मिलित किया जा चुका है?
  • कि गूगल ने वर्ष २००३ में अपने 'गूगल टूलबार' तंत्र में 'ब्लॉग दिस' का बटन भी शामिल किया?

यार तुम पोस्ट लिखो, आत्महत्या लोग अपने आप कर लेंगे
[Thu Aug 21 15:38:12 EDT 2008 | अनूप शुक्ल की प्रविष्टि | ]

परसों कुश की चर्चा के बाद से चिट्ठाचर्चा के पाठक दोगुने हो गये। अब उनसे लोगों की आशायें हैं कि वे नियमित अपने जलवे दिखायें। पंगेबाज खांसी से हलकान हैं। ज्ञानजी कलकतिया लफ़ड़े की जांच करने के लिये घटनास्थल के लिये रवाना हो गये हैं। शिवकुमार मिश्र ने पत्र पुराण आगे बढ़ाते हुये अनूप भैया को जबाबी खत लिखा है। अब देखना है वो क्या जबाब देते हैं।

प्रमोद सिंहजी वैसे ही पटकनी खाये पड़े थे मुम्बई में लेकिन बारिश में घुटना भी तुड़वा बैठे। आह से उपजा होगा गान की तर्ज पर ये दर्द निकला उनका।

चवन्नी चैप पर आजकल सिने अभिनेताओं के इंटरव्यू आ रहे हैं। आज बिपासा से मिलिये। कहती हैं- जो काम मिले, उसे मन से करो: अब जिसके पास काम ही न हो वो क्या करे? आयोडेक्स मले, काम पे चले?

अनिल रघुराज ने अनंतमूर्ति का लेख अनुदित करके पेश किया पठनीय लेख।

वसूली एजेंटवसूली एजेंट

गुलाबी शहर जयपुर के बासिन्दे अभिषेक नित-नये कार्टून पेश करते हैं। आज उनकी निगाह में वसूली एजेंन्ट आ गये। आप भी बनियेगा?

दीपक भारतदीप समझाते हैं हिट की परवाह की तो ब्लाग पर लिखना कठिन होगा:
अंतर्जाल पर बेहतर साहित्य लिखने वालों का भविष्य उज्जवल है पर उसके लिये उनको धैर्य धारण करना होगा। इन फोरमों पर अपने ब्लाग अवश्य पंजीकृत करवायें पर हिट के लिये आम पाठक की दृष्टि से ही लिखने का विचार करें। ब्लाग लेखकों से संपर्क रखना आवश्यक है क्योंकि इनमें कई लोग तकनीकी रूप से बहुत कुछ सीख गये हैं और उनके ब्लाग पढ़ते रहना चाहिए।

लेकिन लोगों की समझ में कहां आता है जी?

समीरलाल जी आज मास्टरी पर उतारू होकर अंदर की बात बताने लगे।

रक्षंदा ने अपनी बात साफ़ करते हुये कहा-
हम एक देश यानी एक घर में रहते हैं, अगर हम ही एक दूसरे को नही जानेंगे और समझेंगे तो क्या कोई दूसरा देश आकर हमें समझेगा?

लेकिन--खुशी हो, गम हो या गुस्सा...कभी एकतरफा नही होता, एक तरफा हो तो इंसान थक जाता है और फिर उसे कहीं ना कहीं अपने नज़र अंदाज़ किए जाने का अहसास ज़रूर होता है

नही....आप बुरा बड़ी जल्दी मान जाते हैं, लेकिन सच्चाई को स्वीकार नही करते, अरे , हम करीब आना चाहते हैं, आप को अपने करीब लाना चाहते हैं लेकिन आप आने तो दें..हम जितना करीब आयेंगे,दूरिया उतनी ही मिटेंगी,ये त्यौहार दूरियां मिटाते हैं, एक दूसरे के करीब लाते हैं, और जब हम एक हैं तो एक होने से डरते क्यों हैं?


चलिये इस खूबसूरत बात पर एकजुट होकर एक लाइना पढ़ते हैं:

एक लाइना


जापानियों की प्रगति का राज : देशप्रेम!

ऐड्डी, हैरी और सिड भी टूंगते रह जाएंगे! : इन चोंचलों के समुद्र में।

बुढ़ापा और मैं : अक्सर बातें करते हैं।

बीती रात रस्किन बॉण्ड मेरे सपने में आए : बाइट दी और कहा हमारे बारे में भी ब्लागिंग करो जी!

पब्लिक की मांग पर -रात की हसीना: पब्लिक की मांग बड़े काम की चीज है!

श्रम संस्कृति का अपमान है बिहरी को भिखारी कहना : सत्यवचन!

कुछ करिये इससे अच्छा मौका न मिलेगा: हम करेंगे तो फ़िर ऊ लोग का करेंगे।

मेघा छाए आधी रात:बैरन बन गई निंदिया !

एक चिट्ठी अनूप भइया के नाम : लेकिन टिपिया सब दूसरे लोग रहे हैं।

जाने कितने मीत होंगे...! : सच में, गिनना और हिसाब रखना आफ़त है।

ओलंपिक में एक खास दिन : बीत गया कल।

दोराहे पर पाकिस्तान.. : चौराहे तक भी जायेगा।

एक अकेला व्यक्ति पहाड़ तोड़ सकता है ? : हां अगर हौसला हो!

पतझड़ के बाद का दुख : झेलोगे?

महाकवि निराला की कविता : चर्खा चला : खेती बाड़ी होने लगी।

कुछ नया करना तो चाह रही थी लेकिन .... : लेकिन हो न सका।

रायपुर से धमतरी जाने वाला ट्रक उड़ने को तैयार है : यात्रीगण कृपया अपना स्थान ग्रहण करें।

कौन सी दवा ले रहे हैं...इस का ध्यान तो रखना ही होगा !!: वर्ना और दवायें लेनी पड़ेंगी।

जाने होगा क्या?
: जो होगा देखा जायेगा।

समयचक्र के उड़ जाने का मुझे काफी दुःख है ?: हम भी दुखी हैं जी।

हिट की परवाह की तो ब्लाग पर लिखना कठिन होगा-संपादकीय :फ़िट बात!

तपत कुरु भ‍इ तपत कुरु बोल रे मिट्ठु तपत कुरु।

मेरी डायरी के पुराने पन्ने : यादों को ताजा करते हैं।

मेरे कन्ने माइंड रीडर है.: इसका अचार डालने की तरकीब खोज रहा हूं।

हरे हरे घाव हरे!..: मलहम-पट्टी से इश्क करें।

पत्रकार सुदामा, शिष्य सुदामा : माने डबल रोल चोचला।

यह मीडिया क्‍या वही चाहता है, जो पुलिस चाहती है? : बताते काहे नहीं जी!

आज का आदमी केवल पॉवर से चलता है: पावरकट है, आदमी सो गया।

तुम हो जाओ ग्लोबल, अपन तो ‘कूपमंडूक’ ही भले: यहीं मजे में हैं हम!

साहित्य अकादमी मे बे-कार जाने का अंजाम:अर्से बाद एक पोस्ट!

पार्टनर आपकी बीट क्या है : और उसे करते कैसे हैं?

आत्‍महत्‍या करूं मैं क्‍या : यार तुम पोस्ट लिखो, आत्महत्या लोग अपने आप कर लेंगे।

अंदर की बात : आखिर बाहर आ ही गयी।

डायमेंडस आर अ गर्ल्स बेस्ट फ्रेंड {?} :सच में? हाऊ स्वीट!

मेरी पसन्द



देश में सब कुछ कमल के लिए हो रहा है
पहले तो लोग समझते रहे
यह एक अच्छी योजना है
क्योंकि कमल एक लड़के का नाम है जो अभी बेरोज़गार है
उसे नौकरी मिल जाएगी

फिर पता चला
कि कमल कोई लड़का नहीं है
देश में चारों तरफ कमल की ही चर्चा है
पहले तो लोग समझते रहे कमल एक सिनेमा टाकीज़ है
जिसकी दीवार अचानक गिर गई रात के शो में
और सैकड़ों लोग दबकर मर गए
फिर पता चला चला कि कमल नाम की कोई टाकीज़ नहीं

देश में आजकल सभी स्कूलों में
कमल के बारे में सवाल पूछे जा रहे हैं
पहले तो बच्चे समझते रहे कि कमल एक राष्ट्रीय फूल है
तालाब में कीचड़ में खिलता है
लेकिन बाद में पता चला कि कमल फूल का नाम भी नहीं है
तो फिर कमल क्या है?
जिसके लिए रात-दिन इतना प्रचार किया जा रहा है
कि जहां जहां झोपिड़यां थी शहर में
वहां कभी घास थी
और घास का ऐतिहासिक महत्व है
इसलिए सभी झोपिड़यों को तोड़कर
घास पैदा की जाएगी

मंहगाई के बोझ तले दबे लोगो
सावधान रहना
कमल एक विचार है
जो आज़ादी के बाद तेज़ी से फैल रहा है
पहले यह कभी दीपक था
जिसके तले अंधेरा जगजाहिर है !

विमल कुमार
सौजन्य: शिरीष कुमार मौर्य

आज की तस्वीर


सफ़र से
और चोखेरबाली से।
सफ़रसफ़र



चोखेरबाली सेचोखेरबाली से

यार ये भाषा तुम अपने ब्लौग के लिये ही बचा कर रखा करो.
[Thu Aug 21 15:38:12 EDT 2008 | अनूप शुक्ल की प्रविष्टि | ]

चिट्ठाचर्चा में कुश भी जुड़ गये हैं। कल उन्होंने धांसू च फ़ांसू शुरुआत की। पंगेबाज भी जल्दी ही जलवा बिखेरने के लिये सज-धज रहे हैं। पुराने चर्चाकार भी आने के लिये मन बनायें। समीरलालजी से खासतौर से कहना है कि वे आलस्य का परित्याग करें। ब्लागजगत के बापू आशाराम बन के चिट्ठाचर्चा रोज करने का खाली-मूली उपदेश देने की बजाय कुछ नियमित मेहनत करने की सोंचे। मेहनत से जी चुराना अच्छी बात नहीं है जी।

मुशर्रफ़मुशर्रफ़
मियां मुशर्रफ़ शायद अपनी ज्यादा फ़जाहत न कराना चाह रहे हों इसलिये उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया। इस पर कार्टूनियाते हुये अभिषेक ने लिखा: मुशर्रफ़! कैसे फ़ौजी हो?बिना लड़े ही हथियार डाल दिये। (देखें बगल का कार्टून)

ज्ञानजी बीमार थे इस लिये ब्लागिंग से दूर थे लेकिन भाभीजी उनके बारे में बेहतर जानती हैं। उन्होंने समझाया- ब्लागिंग से दूर हैं इसलिये तबियत नासाज है। मनचाही सलाह मिलते ही ज्ञानजी रागदरबारी गाने लगे:-
गालियां इमोशंस को बेहतर अभिव्यक्त करती हैं। गालियां बुद्धि की नहीं रक्त की भाषा बोलती हैं। बुद्धि का आटा ज्यादा गूंथने से अगर अवसाद हो रहा हो तो कुछ गालियां सीख लेनी चाहियें - यह सलाह आपको नहीं, अपने आप को दे रहा हूं। यद्यपि मैं जानता हूं कि शायद ही अमल करूं, अपने टैबूज़ (taboo - वर्जना) के चलते!


ज्ञानजी को गालियों के सामाजिक महत्व पर और चिन्तन करना चाहिये। अस्वस्थता में चिन्तन अच्छी दवा साबित होती है।

रक्षंदा शबेबरात की जानकारी देते हुये बताती हैं :

शब-ऐ-बारात बहुत ही ख़ास दिन है. जो परसों मनाया गया.
ये इमाम-ऐ-ज़माना (12th इमाम) हजरत मेहदी आखिर-उज़-जमां अलाहिस्सलाम की पैदाइश का मुबारक दिन है. जो निहाइत ख़ुशी का दिन है.
इस मौके को दीवाली की तरह मनाते हैं. वैसे ही घरों को मोम बत्तियों से सजाया जाता है. पटाखे आतश बाज़िओं से माहौल चरागाँ सा हो जाता है. कई तरह के पकवान बनाए जाते हैं. जिन में तीन चार तरह के हलवे, जैसे चने कि दाल का हलवा, सूजी का हलवा, मैदे और मूंग दाल का हलवा, पूरी पराठे, चिकन पुलाव खीर बनायीं जाती है. फिर नज़र दिया जाता है.


जो दुआ पढी जाती है इस दिन उसका मतलब होता है:
ऐ इमाम-ऐ-ज़माना मेरे मुल्क के लोगों को हर आफत और मुसीबत से दूर रखियेगा. इस मुल्क में सुकून और खुशियाँ हों, तरक्की के साथ साथ मेरे देश के लोगों को बे राह रवी और बुराइयों से दूर रखियेगा(आमीन)




पल्लवी एक बेहतरीन गजल पेश करती हैं:
बंद कमरे बताएँगे हकीकत उनकी
जो हैं दुनिया में फरिश्तों की तरह

पल में ग़म भूल खिलखिलाते हैं
खुदा,कर दो मुझे बच्चों की तरह


रश्मि प्रभा का कहना है:
कॉफी और मौसम तो बस बहाना है-
साथ बैठने का,
रिश्तों की खोई गर्मी को लौटाने का.........
बादल तो फिर चले जायेंगे,
बिजलियों की कड़क,
बारिश की फुहारें थम जाएँगी,
मुमकिन है कॉफी ठंडी हो जाए!
पर अगर हाथ थाम लो
तो जीवन की राहें आसान हो जाएँ
और कॉफी की खुशबू साथ हो जाए....


मानसी आजकल फ़ुरसत में हैं। तभी वे लड्ड बांट रही हैं, सजी-धजी सुन्दर शाम को देखकर गुनगुना रही हैं, और कुछ नहीं मिल रहा है तो भटकाव का शिकार हो रही हैं:
कई परत गहराई से उठ कर
छलावे के ही पास भटकी
संसार छोड़ संसार पा लेने
किसी अनजाने अधर अटकी
खुशी अपनी सीमा आँकने
मचल पड़ी


मननीय पोस्ट
: 2012 में प्रलय होना असंभव

विचारणीय पोस्ट: अँग्रेज भगवान

सुन्दर सलाह: अपने ब्लॉग को और बेहतर बनायें

बधाई: कबाड़खाना की पांच सौवीं पोस्ट पर।

अब कुछ एक लाइना


एक चिट्ठी शिवजी के नाम : फ़ोकट का टाइम वेस्ट!

इश्क -मुश्क आग का दरिया ओर छापामार सेना ... : का संयुक्त हमला डा.अनुराग पर।

त्राहि माम गुरुदेव समीर जी मैं आयन्दा ब्लागरी नही करूंगा !

कैसे-कैसे नर्क...? ...पुराण चर्चा : पढ़ के अपना नर्क अपने आप चुनिये।

3भाई~ 3गीत : बच गये कौरव चले गये। वे होते तो १०० भाई ~ गीत होता।

ये रहे अहमदाबाद विस्फ़ोटों के गद्दार: पहचान में नहीं आ रहे! इससे ज्यादा आसानी से हम अनाम ब्लागर पहचान लेते हैं।

हे भगवान! तुम पर लानत है:तुमने अपना ब्लाग तक नहीं बनाया!

महान पंगेबाज की अंतिम यात्रा : पहला रिहर्सल शुरु!


है राम के वजूद पे हिन्दुस्तां को नाज़ : वाह भई मियां हिन्दुस्तान ये तो बड़ा नेक जज्बा है। बनाये रखो।

बस उस से कुछ ज़्यादा "इंसान" होता: फ़िर तो ऐश कटती गुरू।

अब सवाल नहीं केवल जबाब चाहिये।

मुसलमानों को घर क्यों नहीं मिलता? आरोप चेप देना आसान होता है।

बादल ले रहे अंगड़ाई : जरा धीरे से मेरे भाई!

ये कोई ब्लौगर मीट नहीं, बस यारों की महफ़िल थी : अच्छा तो क्या महफ़िल में रतजगा भी हुआ था?


शबाना जी, तेरा मेरा दर्द ना जाने कोई : आइये हम एक-दूजे का दर्द पढें , आगे बढें।

सहजता,कहीं मोल मिलती है क्या?: मिले तो हमारे लिये भी तौला लेना भैया किलो-दो किलो।


भगवान्" का शाब्दिक अर्थ क्या है?: बताओ अगर कोई भगवान का आदमी मौजूद हो तो।

भविष्यद्रष्टा : एक चिरकुट सी परचून की दुकान पर।

सस्ते में टपकाना :हो आलोक पुराणिक से सम्पर्क करिये। उचित दाम, बाजिब काम- मोबाइल नं:98100-18799

2012 में प्रलय होना असंभव : इसलिये मस्त रहें तथा चैनलों व अखबारों की प्रलय भरी बेवकूफियों का आनंद लें।

ज़रूरी है नापजोख और मापतौल... : इंचीटेप और बांट बेचने वालों के पेट पालने के लिये।

"महान पंगेबाज की अंतिम यात्रा " सुदामा की डायरी से : ई ससुर रोज अंतिम यात्रा करता है।

क्षणिकायें: अच्छा!! दिखाओ!

औरत होने की सज़ा क्या है ?:देखिये, आपके सामने कच्चा माल ही हाज़िर है!


तू जिस रोज उसे समझ जाएगा।: बहुत पछतायेगा, सर सजदे में झुक जायेगा।

क्या शामें भी उदास होती हैं? :यार ये भाषा तुम अपने ब्लौग के लिये ही बचा कर रखा करो..

क्षमा : मांगकर शर्मिन्दा न करें , लिखती रहें।

बढती हुई यौनिक गंदगी! : से बचने के लिये शास्त्रीजी से परामर्श लें।

कैलाश पर निर्माण पूर्णता की और !: अपने लिये जगह बुक करायें, पहले आयें-पहले पायें।

पत्रकारों की फौज करेगी मौज : फ़ौज ज्वाइन करिये।

छत पर खेले : अरे वाह, अले लेले।

टापलैस बाइक परेड को मिली हरी झंडी : टापलेस लेकिन हेलमेट लगा के।

ज़िन्दगी बहुत खूबसूरत होती है..:एक कातिल हसीना की तरह|

देवताओं का नगर--रॉक गार्डन:घूमिये रंजना के साथ|

मेरी पसन्द


नष्ट कुछ भी नहीं होता,
धूल का एक कण भी नहीं,
जल की एक बूंद भी नहीं
बस सब बदल लेते हैं रूप

उम्र की भारी चट्टान के नीचे
प्रेम बचा रहता है थोड़ा सा पानी बनकर
और अनुभव के खारे समंदर में
घृणा बची रहती है राख की तरह

गुस्सा तरह-तरह के चेहरे ओढ़ता है,
बात-बात पर चला आता है,
दुख अतल में छुपा रहता है,
बहुत छेड़ने से नहीं,
हल्के से छू लेने से बाहर आता है,

याद बादल बनकर आती है
जिसमें तैरता है बीते हुए समय का इंद्रधनुष
डर अंधेरा बनकर आता है
जिसमें टहलती हैं हमारी गोपन इच्छाओं की छायाएं

कभी-कभी सुख भी चला आता है
अचरज के कपड़े पहन कर
कि सबकुछ के बावजूद अजब-अनूठी है ज़िंदगी
क्योंकि नष्ट कुछ भी नहीं होता
धूल भी नहीं, जल भी नहीं,
जीवन भी नहीं
मृत्यु के बावजूद

प्रियदर्शन

आज की तस्वीरें:


फ़ूलफ़ूल

पल में ग़म भूल खिलखिलाते हैं
खुदा,कर दो मुझे बच्चों की तरह

शाम आई धीरे से...शाम आई धीरे से...
सजधज सुंदर संध्या आई,और गुनगुना उठा समां से

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देबाशीष चक्रवर्ती

देबाशीष चक्रवर्ती जन्म से बनारसी देबाशीष चक्रवर्ती का लालन पालन भोपाल में हुआ, पिता सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी भेल में यहीं कार्यरत रहे और यहीं बस भी गए। माताजी लखनऊ की हैं। मनचाही मंज़िल की तलाश में यायावर मन ने कई राहें पकड़ीं। अखबारों में संपादक के नाम पत्र से शुरुवात हुई, स्कूल व कॉलेज की पत्रिकाओं के संपादक मंडल में रहे और बस मुगालते में आ गए कि लेखक बन सकते हैं सो वैद्युत अभियांत्रिकी में ईंजीनियरिंग के बाद जा पहुँचे नईदुनिया में, पर एक माह में ही सत्य से साक्षात्कार हो गया जब तनख्वाह बताई गई महज़ ५०० रु माहवार। हालांकि फीचर लेखन जारी रहा नवभारत, नई दुनिया, भास्कर, जागरण, देशबंधु, क्रॉनिकल, फ्री प्रेस सभी के लिये लिखा। कॉलेज में मित्र के साथ भित्ती पत्रिका (वॉल मैगेज़ीन) की नींव डाली। ६ साल वैद्युत उत्पादनों का विपणन किया, सारा मध्यप्रदेश नाप लिया, गुना से बैलाडिला तक। सन २००० में यह नौकरी छोड़ चल पड़े सूचना प्रोद्योगिकी की राह, इंदौर, मुम्बई और संप्रति पुणे। २००२ में एफएम रेडियो में यूँ ही भाग्य आजमाया, चुने गए पर फिर पारिश्रमिक पर बात नहीं बनी। आजकल रेडियो सुनते हैं तो लगता है अच्छा ही किया, रचनात्मक लेखन की गुंजाईश ही कहाँ रखी व्यावसायिक वरीयताओं ने।[पूरा पढ़ें]

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