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कैटरीना कैफ़ के साथ आलोक पुराणिक की जुगलबंदी
[Fri May 16 04:48:12 EDT 2008 | अनूप शुक्ल की प्रविष्टि | ]
हूँ अजीम मैं शायर, मैं हूँ महाकवि : दिल को बहालने को गीतकार ये ख्याल अच्छा है।
....तो मेरे हक़ में दुआ करोगे ! : वायदा नहीं कर सकते लेकिन कोशिश करेंगे।
हनुमान जयंती के दिन भाई समीर " उड़नतश्तरी "से साक्षात् मुलाकात : साधुवाद, साधुवाद!
ब्लॉग मतलब बिंदास लिख : लोग चाहें पढ़ें या न पढ़ें।
अजब-गजब मुशायरा :मुशायरे के शोर से सहम कर गांव की सरहद पर गीदड़ों ने बोलना बन्द कर दिया था।
ई पापा बहुत हरामी हौ! : पटक के मारा जाये।
खोये वहीं पर ..... : फ़िर मिलेंगे चिंतित न हों।
अस्सी वर्षीया कैटरीना कैफ :के दर्शन करा रहे हैं चालीस जमा कुछ के आलोक पुराणिक!
बापू कैद में (व्यंग्य नाटक) कर रहें राजेन्द्र त्यागी। देखिये न!
धोती खुल गई भैया !! कस के बांधना चाहिये, अच्छा हुआ लंगोट पहने थे।
हर बार जिंदगी , जीत गयी! : ये बढि़या रहा!
ब्लॉगर हलकान 'विद्रोही' की ब्लॉग-वसीयत : लीक हो गयी। शिवकुमार मिश्र ने जिम्मेदारी ली।
मेरी पसंद
किस ने किया , किस का इंतज़ार ? क्या पेड़ ने , फल फूल का ? फल ने किया क्या बीज का ? बीज ने फ़िर किया पेड़ का ? हर बार जिंदगी , जीत गयी !
प्रेमी ने पाई परछाईँ , अपने मस्ताने यौव्वन की , प्रिया की कजरारी आंखों में , शिशु मुस्कान चमकती - सी , और ,उस बार भी जिंदगी जीत गयी !
हर पल परिवर्तित परिदृश्यों में , उगते रवि के फ़िर ढलने में , चन्दा के चंचल चलने में , भूपाली के उठते स्पंदन में , रात - यमन तरंगों में , हर बार जिंदगी जीत गयी !
साधक की विशुद्ध साधना में , तापस की अटल तपस्या में , मौनी की मौन अवस्था में , नि: सीम की निशब्द क्रियाओं में मुखरित , हर बार जिंदगी जीत गयी !
लावण्या
विदा की बात मत करना
[Fri May 16 04:48:12 EDT 2008 | अनूप शुक्ल की प्रविष्टि | ]
भौको मत, एम्.फिल हो जाने दो ये शीर्षक है विनीत कुमार की आज की पोस्ट का। विनीत गाहे बगाहे में अपने कालेजियेट किस्से सुना रहे हैं और मजे ले लेकर सुना रहे हैं। आप न पढ़ें हों पढि़ये तो मजा आयेगा। उनके ब्लाग का उपरका मंजिल में लिखा है-जब हां जी सर ....हां जी सर कल्चर में दम घुटने लगे और मन करे कहने का कि - कर लो जो करना है .... ।जिन लोगों ने कभी पोस्टर बाजी की है उनको विनीत का दर्द अपना दर्द लगेगा जब वे पढ़ेंगे- रात मे जब माता जागरण के पोस्टर के ऊपर मै दुनिया को बदल देने वाली पोस्टर लगता तो मिरांडा हौस के आगे बहुत सारे काले कुत्ते भौकने लगते, बहुत दूर तक मुझे दौडाते । कभी छिल जाता, कभी गिर जाता और सारे पोस्टर बिखर जाते। मै रोते हुये कहता, क्यो भौकते हो, विचारधारा छुड़वा दोगे क्या, एम्.फिल मे हो जाने दो। एक बार तो हॉस्टल से आटे की लाई बनाकर ले गया था और कुत्ते के चक्कर मे सब गिर गयी। दुबारा बनाकर पोस्टर लगाने मे चार बज गये थे।
पंकज अवधिया के लेख हम ज्ञानजी की वुधवारी पोस्ट में बांचते रहते हैं। इस बार की पोस्ट का उनका शीर्षक था विकास में भी वृक्षों को जीने का मौका मिलना चाहिये |हेडिंग संजय तिवारी को तकलीफ़ देने वाली लगी। कुछ लोगों के एतराज पर उन्होंने अपनी बार फिर से रखी कि पंकज अवधिया जी के लेख भाषण ही होते हैं। इस लेख पर नीरज रोहिल्ला ने टिपियाया भी- मुझे तो इस टाईटल में कोई दम्भ या भाषण नहीं दिख रहा । हो सकता है मुझे भाषा की समझ न हो, लेकिन आज दो बातों से निराशा हुयी है ।
१) पहला तो बिना बाता का मुद्दा बनाकर एक पोस्ट डालना । २) फ़िर उसके बाद भी मुद्दे का पीट पीट कर दम निकालने का दूसरी पोस्ट में प्रयास करना ।
आपकी लेखनी सशक्त है, यदि आप इसे विवादों के स्थान पर कुछ मौलिक लिखने में लगायेंगे तो मेरे जैसे पाठकों को बडी खुशी मिलेगी
पंकज अवधिया जी कुछ ज्यादा ही संवेदनशील हैं शायद और उन्होंने हिंदी ब्लाग जगत से इस्तीफ़ा अपनी पोस्ट पर पटक दिया। इस पर संजय तिवारी की टिप्पणी है - मैं जानता हूं जमीन से जुड़ा आदमी यह शायद ही लिखे कि विकास में वृक्षों को भी मौका मिलना चाहिए. मुझे दुख हुआ कि आप जैसा जमीनी आदमी ऐसा कैसे लिख सकता है. यही सवाल हमने ब्लाग पर भी किया है.
दूसरी बात कि आपके लेखों में मुझे तथ्यों का अभाव हमेशा खटकता है. यह इसलिए भी हो सकता है कि एक पाठक के तौर पर मैं तार्किक मजबूती के लिए तथ्यों की अपेक्षा करता हूं.
ये दो सवाल अगर आपको अपमानजनक लगते हैं और आपको ठेस पहुंची है तो मैं आपसे पहले ब्लाग जगत को विदा बोलता हूं.
यह सब देखकर अहसास होता है कि मानव उम्र दराज होने के साथ साथ अपना बचपना कितने यत्न से बचा के रख सकता है। पंकज अवधिया जी और संजीव तिवारी जी आप लोग ऐसे विदाई मांगेगे तो क्या मिल जायेगी। टाइम खोटी करते हैं जी आप लोग। कविता करिये विस्फोट करिये लेकिन ई विदा की बात मत करिये। ई लो एक ठो कविता याद आ गयी। बहुत दिन बाद। शुक्रिया दोनों साथियों का कि उनके चलते याद आई। लिख रहा हूं ताकि बाद में भी काम आये-
मेरी पसन्द विदा की बात मत करना
अभी मदहोश आंखों में कनक कंगन नहीं फ़ूले अम्बर की अटारी में नखत नूपुर नहीं झुले।
न काजर आंज पायी है, न जूड़ा बांध पायी है यहां भिनसार की बेला उनीदे आंख आयी है।
कह दो मौत से जाकर न जब तक जी भर जिंदगी जीं लें विदा की बात मत करना।
रचनाकार -पता नहीं है जी। रचना भी अधूरी है लेकिन पूरी करेंगे खोज के। :)
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आशीष गर्ग
मेरा चिट्ठा के लेखक आशीष गर्ग बहुमुखी प्रतिभा के धनी है। इनका जन्म १३ सितम्बर १९७३ को कायमगंज, जिला फर्रूखाबद, उ.प्र. में हुआ। बचपन वहीं बीता। फिर 9 साल कायमगंज में रहने के बाद, 3 साल तक पुखरायां (कानपुर देहात) में रहे, उसके बाद कानपुर में। प्रारम्भिक पढाई कानपुर में करने के बाद वे फिर निकल लिये एन.आई.टी नागपुर से धातुकर्म अभियांत्रिकी में स्नातक करने, फिर मूड फ्रेश करने के लिये एक साल तक टाटा स्टील मुंबई में नौकरी की। अब ज्यादा दिन नौकरी में मन नहीं लगा फिर निकल लिये बंगलोर स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान से परास्नातक करने।[पूरा पढ़ें]
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