• कि एस.वी रचित प्रभातनां पुष्पो पहला ज्ञात गुजराती चिट्ठा है।
  • कि चिट्ठाकारी के लिये चीनी शब्द बो के है जिसका पहली बार प्रयोग फैंग जिंगडाँग ने किया।
  • क्या आप जानते हैं कि ब्लॉग शब्द आक्सफॉर्ड शब्दकोश में सम्मिलित किया जा चुका है?
  • कि गूगल ने वर्ष २००३ में अपने 'गूगल टूलबार' तंत्र में 'ब्लॉग दिस' का बटन भी शामिल किया?

कैटरीना कैफ़ के साथ आलोक पुराणिक की जुगलबंदी
[Thu May 15 16:12:28 EDT 2008 | अनूप शुक्ल की प्रविष्टि | ]

हूँ अजीम मैं शायर, मैं हूँ महाकवि : दिल को बहालने को गीतकार ये ख्याल अच्छा है।

....तो मेरे हक़ में दुआ करोगे ! : वायदा नहीं कर सकते लेकिन कोशिश करेंगे।

हनुमान जयंती के दिन भाई समीर " उड़नतश्तरी "से साक्षात् मुलाकात : साधुवाद, साधुवाद!

ब्लॉग मतलब बिंदास लिख : लोग चाहें पढ़ें या न पढ़ें।

अजब-गजब मुशायरा :मुशायरे के शोर से सहम कर गांव की सरहद पर गीदड़ों ने बोलना बन्द कर दिया था।

ई पापा बहुत हरामी हौ! : पटक के मारा जाये।

खोये वहीं पर ..... : फ़िर मिलेंगे चिंतित न हों।

अस्सी वर्षीया कैटरीना कैफ :के दर्शन करा रहे हैं चालीस जमा कुछ के आलोक पुराणिक!

बापू कैद में (व्यंग्य नाटक) कर रहें राजेन्द्र त्यागी। देखिये न!

धोती खुल गई भैया !! कस के बांधना चाहिये, अच्छा हुआ लंगोट पहने थे।

हर बार जिंदगी , जीत गयी! : ये बढि़या रहा!

ब्लॉगर हलकान 'विद्रोही' की ब्लॉग-वसीयत : लीक हो गयी। शिवकुमार मिश्र ने जिम्मेदारी ली।

मेरी पसंद

किस ने किया , किस का इंतज़ार ?
क्या पेड़ ने , फल फूल का ?
फल ने किया क्या बीज का ?
बीज ने फ़िर किया पेड़ का ?
हर बार जिंदगी , जीत गयी !

प्रेमी ने पाई परछाईँ ,
अपने मस्ताने यौव्वन की ,
प्रिया की कजरारी आंखों में ,
शिशु मुस्कान चमकती - सी ,
और ,उस बार भी जिंदगी जीत गयी !

हर पल परिवर्तित परिदृश्यों में ,
उगते रवि के फ़िर ढलने में ,
चन्दा के चंचल चलने में ,
भूपाली के उठते स्पंदन में ,
रात - यमन तरंगों में ,
हर बार जिंदगी जीत गयी !

साधक की विशुद्ध साधना में ,
तापस की अटल तपस्या में ,
मौनी की मौन अवस्था में ,
नि: सीम की निशब्द क्रियाओं में
मुखरित , हर बार जिंदगी जीत गयी !

लावण्या

विदा की बात मत करना
[Thu May 15 16:12:28 EDT 2008 | अनूप शुक्ल की प्रविष्टि | ]

भौको मत, एम्.फिल हो जाने दो ये शीर्षक है विनीत कुमार की आज की पोस्ट का। विनीत गाहे बगाहे में अपने कालेजियेट किस्से सुना रहे हैं और मजे ले लेकर सुना रहे हैं। आप न पढ़ें हों पढि़ये तो मजा आयेगा। उनके ब्लाग का उपरका मंजिल में लिखा है-जब हां जी सर ....हां जी सर कल्चर में दम घुटने लगे और मन करे कहने का कि - कर लो जो करना है .... ।जिन लोगों ने कभी पोस्टर बाजी की है उनको विनीत का दर्द अपना दर्द लगेगा जब वे पढ़ेंगे-

रात मे जब माता जागरण के पोस्टर के ऊपर मै दुनिया को बदल देने वाली पोस्टर लगता तो मिरांडा हौस के आगे बहुत सारे काले कुत्ते भौकने लगते, बहुत दूर तक मुझे दौडाते । कभी छिल जाता, कभी गिर जाता और सारे पोस्टर बिखर जाते। मै रोते हुये कहता, क्यो भौकते हो, विचारधारा छुड़वा दोगे क्या, एम्.फिल मे हो जाने दो। एक बार तो हॉस्टल से आटे की लाई बनाकर ले गया था और कुत्ते के चक्कर मे सब गिर गयी। दुबारा बनाकर पोस्टर लगाने मे चार बज गये थे।


पंकज अवधिया के लेख हम ज्ञानजी की वुधवारी पोस्ट में बांचते रहते हैं। इस बार की पोस्ट का उनका शीर्षक था विकास में भी वृक्षों को जीने का मौका मिलना चाहिये |हेडिंग संजय तिवारी को तकलीफ़ देने वाली लगी। कुछ लोगों के एतराज पर उन्होंने अपनी बार फिर से रखी कि पंकज अवधिया जी के लेख भाषण ही होते हैं। इस लेख पर नीरज रोहिल्ला ने टिपियाया भी-
मुझे तो इस टाईटल में कोई दम्भ या भाषण नहीं दिख रहा । हो सकता है मुझे भाषा की समझ न हो, लेकिन आज दो बातों से निराशा हुयी है ।

१) पहला तो बिना बाता का मुद्दा बनाकर एक पोस्ट डालना ।
२) फ़िर उसके बाद भी मुद्दे का पीट पीट कर दम निकालने का दूसरी पोस्ट में प्रयास करना ।

आपकी लेखनी सशक्त है, यदि आप इसे विवादों के स्थान पर कुछ मौलिक लिखने में लगायेंगे तो मेरे जैसे पाठकों को बडी खुशी मिलेगी


पंकज अवधिया जी कुछ ज्यादा ही संवेदनशील हैं शायद और उन्होंने हिंदी ब्लाग जगत से इस्तीफ़ा अपनी पोस्ट पर पटक दिया। इस पर संजय तिवारी की टिप्पणी है -

मैं जानता हूं जमीन से जुड़ा आदमी यह शायद ही लिखे कि विकास में वृक्षों को भी मौका मिलना चाहिए. मुझे दुख हुआ कि आप जैसा जमीनी आदमी ऐसा कैसे लिख सकता है. यही सवाल हमने ब्लाग पर भी किया है.

दूसरी बात कि आपके लेखों में मुझे तथ्यों का अभाव हमेशा खटकता है. यह इसलिए भी हो सकता है कि एक पाठक के तौर पर मैं तार्किक मजबूती के लिए तथ्यों की अपेक्षा करता हूं.

ये दो सवाल अगर आपको अपमानजनक लगते हैं और आपको ठेस पहुंची है तो मैं आपसे पहले ब्लाग जगत को विदा बोलता हूं.


यह सब देखकर अहसास होता है कि मानव उम्र दराज होने के साथ साथ अपना बचपना कितने यत्न से बचा के रख सकता है। पंकज अवधिया जी और संजीव तिवारी जी आप लोग ऐसे विदाई मांगेगे तो क्या मिल जायेगी। टाइम खोटी करते हैं जी आप लोग। कविता करिये विस्फोट करिये लेकिन ई विदा की बात मत करिये। ई लो एक ठो कविता याद आ गयी। बहुत दिन बाद। शुक्रिया दोनों साथियों का कि उनके चलते याद आई। लिख रहा हूं ताकि बाद में भी काम आये-

मेरी पसन्द
विदा की बात मत करना

अभी मदहोश आंखों में कनक कंगन नहीं फ़ूले
अम्बर की अटारी में नखत नूपुर नहीं झुले।


न काजर आंज पायी है, न जूड़ा बांध पायी है
यहां भिनसार की बेला उनीदे आंख आयी है।

कह दो मौत से जाकर न जब तक जी भर जिंदगी जीं लें
विदा की बात मत करना।

रचनाकार -पता नहीं है जी। रचना भी अधूरी है लेकिन पूरी करेंगे खोज के। :)

More entries | Archives

प्रेमपीयूष

प्रेमपीयूष ये आये, लिखना शुरु किया और सबको भा गये। प्रख्यात कथाकार फणीश्वरनाथ 'रेणु' के अंचल पूर्णिया, बिहार मे जन्में और नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के साथ जन्मदिन (२३ जनवरी) मनाने वाले प्रेमपीयूष होनहार छात्र रहे हैं। नवोदय विद्यालय से मेरिट छात्रवृत्ति पाकर, इंदिरा गांधी विश्वविद्यालय नई दिल्ली से कम्पयूटर अप्लीकेशनस् में स्नातक (BCA) तथा परास्नातक (MCA) की उपाधि प्राप्त की। परास्नातक के दौरान मनोरोगियों तथा डाक्टरों (मनोचिकित्सकों) के लिये वेबसाइट विकसित की। संप्रति बिहार सरकार के वित्त विभाग के लिये साफ्टवेयर विकसित कर रहे हैं। प्रेमपीयूष अपने बारे में बताते हुये कहते हैं:-

उन्हीं राहों के अनजान पथिक
जो साथ हँसते, गाते और रोते थे,
उनको खोने का दुःख तो होता है
फिर प्रेमवश सपनों मे मिल आता हूँ।

गाने तथा लिखने के शौकीन प्रेम प्रोग्रामिंग तथा मल्टीमीडिया सॉफ्टवेयर दोनों में सिद्धहस्त हैं।[पूरा पढ़ें]

  • सारे परिचय पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
Your browser is Java illiterate. Get a modern browser man!
[Others Include: Assamese:1, Bengali:10, Gujarati:12, Kashmiri:1 and Sindhi:1]

चिट्ठाकार गूगल समूह के सदस्य बनें
ईमेल पता:  
पुरालेख देखें
 परिकल्पना व रचनाः देबाशीष चक्रवर्ती
क्रियेटिव कॉमन लाईसेंस के अंतर्गत सर्वाधिकार सुरक्षित।
Page generated in 4043 milli seconds.